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द्रोण पर्व
अध्याय ७५
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सञ्जय़ उवाच
शल्यानुद्धृत्य पाणिभ्यां परिमृज्य च तान्हय़ान् |  १५   क
उपावृत्य यथान्याय़ं पाय़यामास वारि सः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति