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द्रोण पर्व
अध्याय ७५
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सञ्जय़ उवाच
रथं युक्त्वा हि दाशार्हो मिषतां सर्वधन्विनाम् |  २३   क
जय़द्रथाय़ यात्येष कदर्थीकृत्य नो रणे ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति