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शल्य पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
ते तु सर्वे महात्मानमूचू राजन्हलाय़ुधम् |  ४   क
शृणु विस्तरतो राम यस्याय़ं पूर्वमाश्रमः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति