द्रोण पर्व  अध्याय ७५

सञ्जय़ उवाच

व्यसृजन्त शरौघांस्ते पाण्डवं प्रति पार्थिवाः |  ६   क
न चाव्यथत धर्मात्मा वासविः परवीरहा ||  ६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति