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आदि पर्व
अध्याय ७६
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शुक्र उवाच
इय़ं चापि कुमारी ते शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी |  ३४   क
सम्पूज्या सततं राजन्मा चैनां शय़ने ह्वय़ेः ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति