शान्ति पर्व  अध्याय ७६

भीष्म उवाच

नैकान्तविनिपातेन विचचारेह कश्चन |  २८   क
धर्मी गृही वा राजा वा व्रह्मचार्यथ वा पुनः ||  २८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति