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द्रोण पर्व
अध्याय ३१
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सञ्जय़ उवाच
अर्जुनास्त्रं तु राधेय़ः संवार्य शरवृष्टिभिः |  ५४   क
तेषां त्रय़ाणां चापानि चिच्छेद विशिखैस्त्रिभिः ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति