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द्रोण पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
एतस्मिन्नन्तरे चैव प्रमत्ते सव्यसाचिनि |  ३८   क
व्यूढानीकस्ततो द्रोणो युधिष्ठिरमुपाद्रवत् ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति