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द्रोण पर्व
अध्याय १६१
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सञ्जय़ उवाच
केचिदासन्निरुत्साहाः केचित्क्रुद्धा मनस्विनः |  २५   क
विस्मिताश्चाभवन्केचित्केचिदासन्नमर्षिताः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति