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द्रोण पर्व
अध्याय १५०
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सञ्जय़ उवाच
ततः प्रादुष्करोद्दिव्यमस्त्रमस्त्रविदां वरः |  ३१   क
कर्णेन विहितं दृष्ट्वा दिव्यमस्त्रं घटोत्कचः |  ३१   ख
प्रादुश्चक्रे महामाय़ां राक्षसः पाण्डुनन्दनः ||  ३१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति