सौप्तिक पर्व  अध्याय २

कृप उवाच

रागात्क्रोधाद्भय़ाल्लोभाद्योऽर्थानीहेत मानवः |  २४   क
अनीशश्चावमानी च स शीघ्रं भ्रश्यते श्रिय़ः ||  २४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति