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भीष्म पर्व
अध्याय ७६
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सञ्जय़ उवाच
संमोह्य सर्वान्युधि कीर्तिमन्तो; व्यूहं च तं मकरं वज्रकल्पम् |  ५   क
प्रविश्य भीमेन निवर्हितोऽस्मि; घोरैः शरैर्मृत्युदण्डप्रकाशैः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति