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द्रोण पर्व
अध्याय ७६
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सञ्जय़ उवाच
स्रंसन्त इव मज्जानस्तावकानां भय़ान्नृप |  १   क
तौ दृष्ट्वा समतिक्रान्तौ वासुदेवधनञ्जय़ौ ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति