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शल्य पर्व
अध्याय २४
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सञ्जय़ उवाच
इन्द्राशनिसमस्पर्शानविषह्यान्महौजसः |  २   क
विसृजन्दृश्यते वाणान्धारा मुञ्चन्निवाम्वुदः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति