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द्रोण पर्व
अध्याय ७६
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सञ्जय़ उवाच
जय़द्रथं समीपस्थमवेक्षन्तौ जिघांसय़ा |  ३०   क
रुरुं निपाने लिप्सन्तौ व्याघ्रवत्तावतिष्ठताम् ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति