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शान्ति पर्व
अध्याय १६१
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वैशम्पाय़न उवाच
धर्मो राजन्गुणश्रेष्ठो मध्यमो ह्यर्थ उच्यते |  ८   क
कामो यवीय़ानिति च प्रवदन्ति मनीषिणः |  ८   ख
तस्माद्धर्मप्रधानेन भवितव्यं यतात्मना ||  ८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति