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अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
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वृहस्पतिरु उवाच
इहलोके च स प्राणी जन्मप्रभृति पार्थिव |  ३४   क
स्वकृतं कर्म वै भुङ्क्ते धर्मस्य फलमाश्रितः ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति