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शान्ति पर्व
अध्याय ४६
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वैशम्पाय़न उवाच
त्रय़ोविंशतिरात्रं यो योधय़ामास भार्गवम् |  १४   क
न च रामेण निस्तीर्णस्तमस्मि मनसा गतः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति