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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७७
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वैशम्पाय़न उवाच
स च वाजी यथेष्टेन तांस्तान्देशान्यथासुखम् |  ४५   क
विचचार यथाकामं कर्म पार्थस्य वर्धय़न् ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति