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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७७
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वैशम्पाय़न उवाच
न हन्तव्या रणे तात क्षत्रिय़ा विजिगीषवः |  ७   क
जेतव्याश्चेति यत्प्रोक्तं धर्मराज्ञा महात्मना |  ७   ख
चिन्तय़ामास च तदा फल्गुनः पुरुषर्षभः ||  ७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति