वन पर्व  अध्याय १५०

वैशम्पाय़न उवाच

तद्दृष्ट्वा लव्धकामः स मनसा पाण्डुनन्दनः |  २८   क
वनवासपरिक्लिष्टां जगाम मनसा प्रिय़ाम् ||  २८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति