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वन पर्व
अध्याय ७७
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वृहदश्व उवाच
सौभ्रात्रं चैव मे त्वत्तो न कदाचित्प्रहास्यति |  २३   क
पुष्कर त्वं हि मे भ्राता सञ्जीवस्व शतं समाः ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति