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वन पर्व
अध्याय ७७
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वृहदश्व उवाच
स तथा सत्कृतो राज्ञा मासमुष्य तदा नृपः |  २७   क
प्रय़यौ स्वपुरं हृष्टः पुष्करः स्वजनावृतः ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति