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अनुशासन पर्व
अध्याय ४
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भीष्म उवाच
तत्तदा गाधय़े तात सहस्रं वाजिनां शुभम् |  १८   क
ऋचीकः प्रददौ प्रीतः शुल्कार्थं जपतां वरः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति