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वन पर्व
अध्याय २१
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वासुदेव उवाच
ततोऽभवत्तम इव प्रभातमिव चाभवत् |  ३४   क
दुर्दिनं सुदिनं चैव शीतमुष्णं च भारत ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति