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शान्ति पर्व
अध्याय ७८
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राजो उवाच
न मे राष्ट्रे विधवा व्रह्मवन्धु; र्न व्राह्मणः कृपणो नोत चोरः |  २६   क
न पारजाय़ी न च पापकर्मा; न मे भय़ं विद्यते राक्षसेभ्यः ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति