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अनुशासन पर्व
अध्याय ७८
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वसिष्ठ उवाच
यावन्ति लोमानि भवन्ति धेन्वा; स्तावन्ति वर्षाणि महीय़ते सः |  २७   क
स्वर्गाच्च्युतश्चापि ततो नृलोके; कुले समुत्पत्स्यति गोमिनां सः ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति