आश्वमेधिक पर्व  अध्याय ७८

वैशम्पाय़न उवाच

स गाढवेदनो धीमानालम्व्य धनुरुत्तमम् |  २३   क
दिव्यं तेजः समाविश्य प्रमीत इव सम्वभौ ||  २३   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति