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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७८
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वैशम्पाय़न उवाच
उवाच चैनं धर्मात्मा समन्युः फल्गुनस्तदा |  ३   क
प्रक्रिय़ेय़ं न ते युक्ता वहिस्त्वं क्षत्रधर्मतः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति