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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १९
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वैशम्पाय़न उवाच
न च मन्युस्त्वय़ा कार्य इति त्वां प्राह धर्मराट् |  ७   क
संस्मृत्य भीमस्तद्वैरं यदन्याय़वदाचरेत् ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति