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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७८
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वैशम्पाय़न उवाच
भर्तारं निहतं दृष्ट्वा पुत्रं च पतितं भुवि |  ३८   क
चित्राङ्गदा परित्रस्ता प्रविवेश रणाजिरम् ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति