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सौप्तिक पर्व
अध्याय ५
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कृप उवाच
यस्तेषां तदवस्थानां द्रुह्येत पुरुषोऽनृजुः |  १२   क
व्यक्तं स नरके मज्जेदगाधे विपुलेऽप्लवे ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति