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वन पर्व
अध्याय ७८
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो हृष्टमना राजा वृहदश्वमुवाच ह |  १६   क
भगवन्नक्षहृदय़ं ज्ञातुमिच्छामि तत्त्वतः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति