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वन पर्व
अध्याय ७८
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वैशम्पाय़न उवाच
वृहदश्वे गते पार्थमश्रौषीत्सव्यसाचिनम् |  १८   क
वर्तमानं तपस्युग्रे वाय़ुभक्षं मनीषिणम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति