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उद्योग पर्व
अध्याय ७८
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नकुल उवाच
श्रोता चार्थस्य विदुरस्त्वं च वक्ता जनार्दन |  १८   क
कमिवार्थं विवर्तन्तं स्थापय़ेतां न वर्त्मनि ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति