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भीष्म पर्व
अध्याय ७८
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सञ्जय़ उवाच
द्रोणं त्रिभिः प्रविव्याध चतुर्भिश्चास्य वाजिनः |  १६   क
ध्वजमेकेन विव्याध सारथिं चास्य पञ्चभिः |  १६   ख
धनुरेकेषुणाविध्यत्तत्राक्रुध्यद्द्विजर्षभः ||  १६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति