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शल्य पर्व
अध्याय ११
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सञ्जय़ उवाच
तद्रजः पुरुषव्याघ्र शोणितेन प्रशामितम् |  ४१   क
दिशश्च विमला जज्ञुस्तस्मिन्रजसि शामिते ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति