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भीष्म पर्व
अध्याय ७८
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सञ्जय़ उवाच
ततोऽस्य विमलं द्रौणिः शतचन्द्रं मनोरमम् |  ३२   क
चर्माच्छिनदसिं चास्य खण्डय़ामास संय़ुगे |  ३२   ख
शितैः सुवहुशो राजंस्तं च विव्याध पत्रिभिः ||  ३२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति