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मौसल पर्व
अध्याय ३
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वैशम्पाय़न उवाच
परस्परं च नक्षत्रं हन्यमानं पुनः पुनः |  १४   क
ग्रहैरपश्यन्सर्वे ते नात्मनस्तु कथञ्चन ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति