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द्रोण पर्व
अध्याय ७८
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सञ्जय़ उवाच
तं कृच्छ्रामापदं प्राप्तं दृष्ट्वा परमधन्विनः |  ३०   क
समापेतुः परीप्सन्तो धनञ्जय़शरार्दितम् ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति