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द्रोण पर्व
अध्याय ७८
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सञ्जय़ उवाच
ते हता हन्यमानाश्च न्यगृह्णंस्तं रथोत्तमम् |  ३४   क
स रथस्तम्भितस्तस्थौ क्रोशमात्रं समन्ततः ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति