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द्रोण पर्व
अध्याय ७८
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सञ्जय़ उवाच
तेषां वैफल्यमालोक्य पुनर्नव च पञ्च च |  ४   क
प्राहिणोन्निशितान्वाणांस्ते चाभ्रश्यन्त वर्मणः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति