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द्रोण पर्व
अध्याय ७८
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सञ्जय़ उवाच
अदृष्टपूर्वं पश्यामि शिलानामिव सर्पणम् |  ६   क
त्वय़ा सम्प्रेषिताः पार्थ नार्थं कुर्वन्ति पत्रिणः ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति