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वन पर्व
अध्याय १९४
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मार्कण्डेय़ उवाच
धृतिमान्क्षिप्रकारी च वीर्येणाप्रतिमो भुवि |  ३   क
प्रिय़ं वै सर्वमेतत्ते करिष्यति न संशय़ः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति