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शान्ति पर्व
अध्याय ७९
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भीष्म उवाच
क्षत्रस्याभिप्रवृद्धस्य व्राह्मणेषु विशेषतः |  २१   क
व्रह्मैव संनिय़न्तृ स्यात्क्षत्रं हि व्रह्मसम्भवम् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति