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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
यजन्ते हि तदा राजन्व्राह्मणा वहुभिः सवैः |  ९९   क
क्षत्रिय़ाश्च प्रवर्तन्ते सर्ववर्णानुरञ्जने ||  ९९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति