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वन पर्व
अध्याय ७९
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वैशम्पाय़न उवाच
यस्य स्म धनुषो घोषः श्रूय़तेऽशनिनिस्वनः |  १५   क
न लभे शर्म तं राजन्स्मरन्ती सव्यसाचिनम् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति