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वन पर्व
अध्याय २६७
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मार्कण्डेय़ उवाच
वृतः कोटिसहस्रेण वानराणां तरस्विनाम् |  २   क
श्वशुरो वालिनः श्रीमान्सुषेणो राममभ्ययात् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति