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वन पर्व
अध्याय ५०
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वृहदश्व उवाच
व्रह्मण्यो वेदविच्छूरो निषधेषु महीपतिः |  ३   क
अक्षप्रिय़ः सत्यवादी महानक्षौहिणीपतिः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति