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कर्ण पर्व
अध्याय २२
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सञ्जय़ उवाच
काय़स्य महतो भेदे लाघवे दूरपातने |  ३५   क
सौष्ठवे चास्त्रय़ोगे च सव्यसाची न मत्समः ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति